शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

अमीर मंदिर गरीब देश

अमीर मंदिर गरीब देश 
तिरूपति बालाजी मंदिर 

लक्ष्मी गोल्डन मंदिर वेल्लौर  

आप सभी जानते हैं की हमारे देश के मंदिर ,संत महात्मा ,बाबा कितने अमीर हैं /हमारे देश के मंदिर तिरूपति बालाजी ,वेल्लोर का लक्ष्मी मंदिर ,सिर्डिवाले साईं बाबा  का मंदिर  आदि ऐसे बहुत से मंदिर जिनके पास जनता के द्वारा चढ़ाये करोड़ों रुपये हैं /जिसका उपयोग या तो मंदिर के विस्तार में या उसको चांदी फिर सोने में मढ़ने में ,या पण्डे,पुजारिओं ,trustees को धर्म के नाम पर बैठे बिठाये अपना स्वार्थ सिद्ध करने के काम आता है /अभी सत्य साईं बाबा के बारे में सब जानते हैं की कैसे उनके कमरे के खजाने में करोड़ों रुपये मिले /कुछ लोग बस में रुपये ले जाते पकडे गए./आज भी उनकी करोड़ों की प्रोपर्टी पर मतभेद चल रहे हैं /कुछ तो हम लोगों को मीडिया के माध्यम  

से पता लग जाता है और बाकी पैसों का क्या हो रहा है कोई नहीं जानता /वेल्लोर का लक्ष्मी मंदिर अभी १०-१५ साल पहले ही बना है पर आज के जमाने में भी जब लोग महंगाई की मार से परेशान है उस मंदिर की पूरी दीवारें 
सोने से मडी हुई हैं /जिसमे लगभग २००tan सोने का उपयोग किया गया है /इतना पैसा कहाँ से आ रहा है ,चदावे
से आ रहा है या कही और से आरहा है ये तो भगवान् ही जानता है /ऐसे  कितने ही मदिर हैं जहाँ लाखों करोड़ों रुपये उनके खजानों में जमा होंगे /इनका सदुपयोग क्यों नहीं हो सकता /
मंदिरों के चदावे में आने वाले धन का हिसाब किताब  का ब्योरा मंदिर के trustees के पास लिखित में होना चाहिए /जितनी जरुरत मंदिर के लिए हो उतना पैसा मंदिर के खजाने में रखकर बाकी पैसा सरकारी  खजाने में जमा होना चाहिए /इससे काफी पैसा सरकार को मिलेगा/जो जरूरतमंद लोगों के काफी काम आ सकता है./मंदिरों के बाहर काफी भिखारी बैठे रहते हैं जो हमारे विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने रहतें हैं /वो  उनका फोटो खीचकर ले जातें हैं और अपने देश में दिखाकर हमारा मजाक बनाते हैं /सबसे पहले तो इन भिखारियों का पूरा विवरण लेकर इनको पैसा देकर काम करने के लिए कहना चाहिए /और उसके बाद भी ये भीख मांगते दिखें  
तो इनके लिए सजा का प्रावधान होना चाहिए /
जनता का पैसा अगर जनता के ही काम आये तो क्या इससे भगवान् खुश नहीं होंगे /जिस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हो ,कितने परिवार गरीबी रेखाओं के नीचे जी रहे हों ,कितने ही परिवारों को दो जून रोटी जुटाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है ,उस देश में करोड़ों रुपये भगवान् के नाम पर इस तरह उपयोग हो  रहें हैं क्या ये ठीक है ,क्यों नहीं इसका उपयोग गरीबों ,किसानो और जरुरत मंदों के लिए हो सकता /हमारे देश मैं धन की कमी नहीं है पर वो छुपा हुआ है जिसका सदुपयोग होना चाहिए /
और इस पैसे से बहुत सारे काम हो सकतें हैं बस अच्छी सोच और ईमानदारी से उपयोग करने की इच्छा हो /सरकारी खजाने में बढोतरी होने से देश की तरक्की में भी बढोतरी होगी /जनता  का पैसा जनता की तरक्की में ही काम आयेगा /जनता खुशहाल तो देश खुशहाल /

मंदिर,मस्जिद,गिरजाघरों में ईश्वर को चदाव श्रद्धा सुमन 
सच्चे मन से सर झुकाकर करो उसको नमन 
पैसे किसी गरीब और जरूरतमंद को दो 
और उसका जीवन खुशियों से भर दो 
यही तुम्हारी ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति होगी 
          तभी जीवन जीने की ख़ुशी और सही राह मिलेगी     
           


21 टिप्‍पणियां:

varun ने कहा…

यह दुखद स्थिति केवल हमारे देश और काल में ही नहीं है, सदियों सदियों और देश देश ये हाल रहा. जब १३-१४ सदी में यूरोप plague से मर रहा था तब चर्च ने खूब पैसे लेके स्वर्ग जाएं का अधिकार दिया. मंदिर हमेशा स्वर्णमंडित रहे और लोग हमेशा असहाय. कुछ दिनों पहले पेरू गया तो वहां भी येही पाया, लीमा के चर्चों के पास बेंतेहा पैसा है और बेचारे लोगों के पास खाने को कुछ नहीं. ऐसे बातें भगवन पर से विश्वास उठातीं हैं.

शालिनी कौशिक ने कहा…

bahut sahi kaha hai aapne prerna ji.yadi ye soch sarvsadharan ki ho jaye to shayaad sabhi mushkilon ka hal hone me kafi madad mil jaye.

रविकर ने कहा…

बहुत अच्छा लगा ||

बधाई |

mahendra srivastava ने कहा…

जी बिल्कुल सही। धर्म के नाम पर आज हम अंधे होते जा रहै हैं। सही मायने में लोग धर्म का अर्थ नहीं समझ पाते हैं। मैने देखा है कि लोग जितने बढे मंदिर में जाते हैं चढावा भी उतना अधिक चढाते हैं और उतनी बड़ी मांग भी ईश्वर के यहां रख देते हैं।
मित्रों मंदिर में सिर्फ दर्शनाभिलाषी बनकर जाएं और सेवा लाचार, असहाय, कमजोर की करें।
आपने वाकई ऐसे विषय को उठाया है जो बहुत जरूरी है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सटीक पोस्ट!

Vivek Jain ने कहा…

लोगों की अंधभक्ति की अभिव्यक्ति हैं यें मंदिर,

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Kunwar Kusumesh ने कहा…

मंदिरों पर चढ़ावा भगवान में श्रद्धावश.
हाथ-पैर से मजबूत भीख मांगने वाले काम नहीं करना चाहते अतः इन्हें पैसा देना उचित नहीं.
हाँ,लाचार अपाहिज को पैसा / खाना देना चाहिए.

Navin ने कहा…

Preraajee,

Very correct. In fact most of the money we are giving in the name to the Temples/Trusts are used by the 'owners' of the God for their comfort.

Read related matter on my article ...
http://navin-2010.blogspot.com/2011/06/bribing-god.html

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

मंदिर हमारी प्राचीन सभ्यता के द्योतक हैं ...!इनसे हमारी आस्था और हमारी सभ्यता जुड़ी हुई है |मंदिरों में दिया गया दान लोकसेवा में ही अर्पित करना चाहिए लेकिन समाज में वो ideal situation तो होती नहीं है |कई जगह मंदिर ट्रस्ट बहुत लोक-सेवा का काम भी कर रहें हैं .पर जनता जागरूक रहे तो ये कोशिश कामयाब हो सकती है .sarthak lekh.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी बात से सहमत हूँ ... ये फर्क जब तक रहेगा ... भगवान नहीं मिलने वाले इन पंडों को ...

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) ने कहा…

सारगर्भित लेख.

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया, सटीक और शानदार लेख! सही लिखा है आपने "अमीर मंदिर गरीब देश"! बेहतरीन प्रस्तुती !

mahendra verma ने कहा…

आपके विचारों से सहमत।
सामयिक और महत्वपूर्ण विषय पर आपने चर्चा की है।
मंदिरों की संपत्ति का देश के विकास के लिए और जरूरतमंदों के लिए खर्च किया जाना उचित होगा।
इससे भगवान भी प्रसन्न होंगे।

: केवल राम : ने कहा…

भगवान् अमीर और भक्त गरीब ....जनता को तन पर पहनने के लिए कपडा नहीं और भगवान् सोने से जडित मंदिर में विराजते हैं .....!

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत बढ़िया, सटीक और शानदार लेख!

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सारगर्भित प्रस्तुति..यह भावना अगर सभी में जाग्रत हो जाये तो वह ईश्वर की सबसे बड़ी अर्चना होगी..

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sargarbhit rachna.......

Babli ने कहा…

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

kaale dhan ka zikr bhee zaruree hai!!

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" ने कहा…

nice,keep it up ,

रेखा ने कहा…

सही कहा आपने .....विश्व के सबसे आमिर मंदिर भारत मैं ही है और भारत की गरीबी से भी सभी अवगत हैं धन का उपयोग सही अर्थों मैं जहाँ होना चाहिए वहां नहीं हो पता है ...सार्थक आलेख