गुरुवार, 5 मई 2011

पीढ़ियों का अंतराल




पीढ़ियों  का अंतराल 

आजकल युवा पीढ़ी परयह इल्जाम लगाए जाते हैं की आजकल के युवा बुजुर्गों का आदर नहीं करते उनकी देखभाल नहीं करते उनको समय नहीं देते /
यह एक सोचने वाली बात है /पुरानी पीढ़ी और एक नई पीढ़ी का अंतराल तो है /परन्तु क्या पुरानी पीढ़ी नए जमाने के साथ अपनी सोच ,अपनी आदतें अपना सहयोग कायम रखतीं हैं/हमारे जमाने का गुणगान करने की जगह नए जमाने में हो रहे बदलाव ,को अपनाएँ अपने बच्चों को आजकल के प्रतियोगी ,भाग-दौड़           वाली जिंदगी में कदम से कदम मिला कर चलने में  सहयोग करें/जो काम वो घर में रहकर आराम से कर सकतें हैं उसको करने में संकोच ना करें और ना ही अपना अहम् बीच में लायें /तो उनका समय भी अच्छे से बीतेगा और उनका मान अपने आप बढेगा /आजकल जिस तरह महंगाई दिन पर दिन बढ़ रही है उसमें एक ब्यक्ति की तनख्वा से ग्रहस्थी  चलाना नामुमकिन है तो पति-पत्नी  दोनों को ही बाहर काम करके अपनी ग्रहस्थी  चलाने की जिम्मेदारी उठानी पढती है /पहले नारी को केवल घर के कार्य ही करने होते थे /बाहर के कार्यों से उनको कोई मतलब नहीं होता था /ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं होतीं थीं और कुछ उस जमाने का माहौल भी ऐसा था की बैंक के काम बच्चों के स्कूल की फीस वग्हेरा का काम पुरुष ही करते थे /परन्तु आजकल नारी दोहरा  कार्य कर रही है/ग्रहस्थी   के कार्य तो कर ही रही है ,पैसे भी कमा रही है और बैंक,स्कूल बाहर के कार्यों की भी जिम्मेदारी  उठा रही है /उसके बाद घर में उससे यह अपेक्षा  रखना तुम्हारे ज़माने  जैसे ही घर के काम करे तुम्हारी पूरी सेवा करे /तुम जैसे चाहो वैसा ही पहने ओढ़े तो क्या यह संभव है /जो बुजुर्ग इन सब बातों को समझतें हैं /अपने विचारों में परिवर्तन ले आतें है समयानुसार नई पीढ़ी के साथ उनकी समस्या को अपने अनुभव के ज्ञान से सुलझाने में मदद करतें हैं / घर के छोटे -छोटे कामों में हाथ बंटाते हैं बेकार की नुक्ताचीनी नहीं करते /बच्चों की मजबूरी और परेशानियों को समझते हैं वो बुजुर्ग घर में पूरा सम्मान पातें हैं ,और कदम-कदम पर घर के प्रत्येक सदस्य की जरुरत बन जातें हैं /आजकल एकल परिवार वाले युग में और ऐसे माहौल में जहाँ इंसान का इंसान पर भी विश्वास करना मुश्किल हो रहा है /बुजुर्गों का साथ में रहने से बच्चों की सुरक्षा ,घर की सुरक्षा की चिन्ता से मुक्त होकर आराम से पति-पत्नी अपने कार्यों पर जा सकते हैं /आज की पीढ़ी को भी ऐसे बुजुर्गों की पूरी इज्जत करना .उनकी स्वास्थ सम्बन्धी देखभालकरना .उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान रखना चाहिए /
अथार्त अगर नए जमाने के साथ ,उसके बदलाव को स्वीकार करते हुए नई पीढ़ी की मजबूरियों को समझते हुए सहयोग करे और नयी पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी को मान सम्मान के साथ उनके अनुभव का लाभ उठाते हुए उनके स्वास्थ का ध्यान रखते हुए अपने कर्तव्यों का ध्यान रखे.तो ये पीदियों में होने वाले विचारों का अंतराल ख़त्म हो जाए /और दोनों पीदियाँ एक दूसरे के बिना रहनें की सोचें भी ना./दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और साथ में रहने से सुरक्षित भी./
साथ में रहने का सुख उठाओ ,एक दूसरे को दिल से अपनाओ 
छोटी-छोटी बातों और अहम्  को भूलकर ,हंसी-खुशी जिंदगी बिताओ  

10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सार्थक और उपयोगी आलेख!
--
बुधवार के चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट की भी चर्चा कर दी जाएगी!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आपका लेख एक गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है.

सादर

रचना दीक्षित ने कहा…

एक अच्छी सोच, प्रेरणा दायी पोस्ट .

Babli ने कहा…

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए! मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया, शानदार और लाजवाब आलेख लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है!

श्यामल सुमन ने कहा…

प्रेरणा जी - नमस्कार। पीढ़ियों के अन्तर को पाटते हुए आपका यह समन्वयवादी आलेख सार्थक लगा। यह वक्त की जरूरत भी है अन्यथा एक पीढ़ी का अनुभव और दूसरे की उर्जा के समेकित ताकत से समाज को वंचित होने का खतरा है। बहुत खूब। बधाई। दूसरी बात लेख पढ़ने के क्रम में मुझे वर्तनी में कुछ त्रुटियाँ दिखायी पड़ी जो इस प्रकार है - दोड़ - दौड़, ग्रहस्ती - गृहस्थी, ज्यदा - ज्यादा, माहोल - माहौल, अपेक्छा - अपेक्षा, विस्वास - विश्वास, दुसरे - दूसरे, ---यदि इसमे भी सुधार हो जाय तो फिर क्या कहने?कभी मैंने भी लिखा था -

करे ईमान की बातें बहुत नादान होता है
मिले प्रायः उसे आदर बहुत बेईमान होता है
यही क्या कम है अचरज कि अभीतक तंत्र जिन्दा है,
बुजुर्गों के विचारों का बहुत अपमान होता है

सादर
श्यामल सुमन
+919955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

आशा ने कहा…

बहुत अच्छा सन्देश देती पोस्ट के लिए बधाई |
आशा

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सार्थक विश्लेषण ... समय के बदलावों को स्वीकार करना आवश्यक है....

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

मेरे ख्याल से यह उतना आसान नहीं है. वो कहते हैं ना "better said than done" बस वही बात है..
हर घर की अपनी कहानी है और इसलिए उतनी ही जटिल भी..
पर आपका एक सकारात्मक रुख भी अच्छा लगा जानकार..

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 29/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक सोच है ..लेकिन हर घर की परिस्थितियां अलग अलग होती हैं ..