यह कैसी निराली रीत
दो साल से देश के बाहर रहने के कारण काफी परिवार के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाई /जिसका मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा ,और उस समय मुझे अपने देश से दूर रहना बहुत अखरा /देश से दूर रहकर ही मैं हमारे देश के सस्कारों और सस्कृति की कीमत अच्छी तरह जान सकी /पर जब मैं अपने देश में वापस आई और मुझे नई पीदियों की शादियों में शामिल होने का अवसर मिला तो मुझे ये देख कर बहुत दुःख हुआ की हमारे देश की कुरीतियाँ नहीं बदली/ आज जब लडकियां लड़कों के बराबर पढ़ रही हैं उनके कंधे से कन्धा मिलाकर काम कर रही हैं / लड़की के माता -पिता भी लड़कियों की पढाई -लिखाई पर उतना ही खर्च कर रहे हैं जितना लड़के के माता-पिता /फिर भी लड़की वालों से कुछ लडके वाले दहेज़ की मांगे रख रहे हैं /लड़की के माता-पिता को उनके हर जायज-नाजायज मांगों को पूरा करने को मजबूरकर रहें हैं /उनके हर रिश्तेदारों के सामने झूक कर उनका मान करने को कह रहे हैं / उनको इतना परेशान कर रहे हैं की खुले विचारों वाले माता-पिता भी अपनी लड़की की शादी के समय ये सोचने लगे की काश आज हम लड़कीवाले नहीं होते /क्योंकि हम अपनी लड़की उनके घर भेज रहे हैं तो क्या उनको अपनी बेज्जती करने का अधिकार दे रहे हैं / उनको मांग के अनुसार दहेज़ दें,वो जैसा चाहें वैसे ही उनके रिश्तेदारों ,बारातियों के स्वागत का इंतजाम करें /हर बात में ये डरते रहें की कही हमसे कोई गलती ना हो जाए ,कही लड़केवाले नाराज ना हो जाएँ /क्यों भई क्या लड़कीवाले हैं तो डराने और दबाने के लिए ही हैं क्या /आज जब हर कदम पर लड़की लड़कों के बराबर हैं तो शादी में ये लडके वाले ऊँचे और लड़कीवाले नीचे कैसे हो सकतें हैं /सिर्फ इसलिए की लड़की विदा होकर लडके के घर जा रही है./ये तो एक तरह की blackmailing होगई की अगर आप ने हमारी बात नहीं मानी तो हम आपकी लड़की को परेशान करेंगे , उसको ताना देंगे , उसके साथ दुर्बेब्हार करेंगे /फिर तो kidnepping और शादी में अंतर क्या हो गया kidnepper भी पैसे के लिए ये सब करता है /अगर kidneper की बात नहीं मानते तो वो kidnep किये गए ब्यक्ति को मार भी देता है /इसी तरह कई लड़कियों के ससुरालवाले भी जब उनकी मांगे पूरी नहीं होती तो वो लड़की को मार भी देते हैं /विवाह को हमारे समाज में अपनी परम्पराओं और संस्कारों में काफी ऊँचे स्थान पर रखा है /इसको साथ जन्मों का बंधन माना गया है / ऐसी पवित्र भावना से बनाई हुई इस रीति को हमने अपने लालच में अंधे होकर blackmailing में परिवर्तित कर दिया /आज जब हम २२वि सदी में जी रहे हैं /नए ज़माने और नई सोच को अपना रहे हैं तो अपने समाज की इन सड़ी-गली कुरीतियों को क्यों नहीं छोड़ पा रहे हैं/लड़की के माता-पिता पर तो अब दोहरी मार पढ़ रही है/ लड़कियों को लड़कों के बराबर पढ़ा भी रहे हैं और इस कुरीति के कारण लड़केवालों की जायज -नाजायज मांगों को भी पूरा कर रहे हैं /और नोकरी करने वाली लड़की के पैसे पर भी शादी के बाद ससुराल वालों का हक हो जाता है .जिसका फायदा भी लड़के और उसके घर वाले उठा रहे हैं/मतलब यह कैसी
निराली रीति है कमाऊ लड़की भी दें,.दहेज़ भी दें,और लड़केवालों के सामने झुकें भी,मतलब लड़केवालों के दोनों हाथ में लड्डू और लड़कीवालों के दोनों हाथ खाली /अगर ये कुरीतियाँ नहीं बदली गईं तो लड़की को गर्भ में मारने की संख्या में और बढोतरी ही होगी /एक समय ऐसा आयेगा की समाज में लड़कियों की संख्या ना के बराबर हो जायेगी /फिर कैसे ये दुनिया चलेगी और कैसे लोगों का वंश आगे बढेगा/इसलिए जागो समाज के कर्ता-धर्ताओं जागो /समाज की इन कुरीतियों को बदलो /अपनी सोच बदलो / रीति-रिवाजों में परिवेर्तन जरुरी है /इसको बदलने में सबको आगे आना चाहिए /और ऐसी कुरीतियों को बदलना ही चाहिए /विवाह जैसी प्यारी परम्परा दो जिंदगियों और दो परिवार को जोड़ने के लिए बनी है /इसे अपने अहम् मान -अपमान ,लालच जैसी बुराइयों के कारण युद्ध का मैदान मत बनाओ /जो लड़की आपके घर आ रही है वो आपका घर ,आपके बेटे का संसार सजाने और आपका वंश बढ़ाने के लिए बहुत अरमानों के साथ आई है / अगर उसके माता-पिता का अपमान करोगे या परेशान करोगे तो उससे भी प्यार और मान की आशा कैसे करोगे//प्यार और इज्जत दोगे तभी प्यार और इज्जत पाओगे /यही जमाने की रीत है /
विवाह जैसी प्यारी रस्म को अपने
लालच के कारण ब्यापार मत बनाओ
यह दो जिंदगियों और दो परिवारों का मेल कराती है
अपना अहम् छोडकर सबको दिल से अपनाओ
तभी आप और आपका परिवार खुश रहेगा
लड़की तथा उसके परिवार से दिल से इज्जत पायेगा
विवाह जैसी प्यारी रस्म को अपने
लालच के कारण ब्यापार मत बनाओ
यह दो जिंदगियों और दो परिवारों का मेल कराती है
अपना अहम् छोडकर सबको दिल से अपनाओ
तभी आप और आपका परिवार खुश रहेगा
लड़की तथा उसके परिवार से दिल से इज्जत पायेगा
22 टिप्पणियां:
बहुत सार्थक प्रस्तुति..आज विवाह केवल दो दिलों और परिवार का मिलन न रहकर एक व्यापार और दिखावे की वस्तु बन कर रह गयी है..बहुत सुन्दर
आपने बहुत सटीक और उपयोगी आलेख लगाया है!
आज ऐसे ही प्रसंगों की आवश्यकता है!
अच्छी प्रस्तुति ||
बधाई ||
मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद.
बेहद प्रासंगिक और सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
बहुत खूब कहा आपने बधाई
देर से आने के लिए क्षमा चाहूँगा बहुत अच्छा विषय उठाया है आपने |
ये कितने आश्चर्य की बात लगती है की हम लड़की वाले होने के साथ साथ
लड़के वाले भी होते हैं फिर भी इस कुप्रथा का अंत करने की कोशिश नहीं करते |
जब अपनी लड़की की शादी करते है तो लड़के वालों के सामने गिडगिडाते है
तथा लाखो आदर्श बखान करते है किन्तु जब अपने लड़के की शादी करनी होती है
तो अनगिनत असंभव दहेज़ की मांग करते हैं | जो की निंदनीय है | इसे तो हमने व्यापार ही बना दिया है |
सरकार लाख कानून बनाए किन्तु जब तक हम खुद अपने में सुधार नहीं करेंगे तब तक
ये कुप्रथा बंद होने वाली नहीं है | जिस नारी की हम देवी मान कर पूजा करते है उसी
नारी की हमारे द्वारा यह दुर्दशा ? कैसा विरोधाभास है यह ?
लड़की जितनी चाहे पढ़ी-लिखी हो शादी के समय उसके परिवार वाले आज भी हाथ बांधे खड़े रहते है...
पता नहीं ये तरीका कब तक बदलेगा....
बहुत बढ़िया...
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग इस ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो हमारा भी प्रयास सफल होगा!
मेरी कविता चर्चा में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
बहुत सुन्दर, सटीक, सार्थक और महत्वपूर्ण आलेख लिखा है आपने! बहुत बढ़िया लगा! ज़बरदस्त प्रस्तुती!
लोग विवाह नहीं व्यापार कर रहे हैं . ! समाज में अभी भी जड़ता है ! स्त्री को वो सम्मान नहीं मिल रहा जिसकी वो हक़दार है !
शादी के बाद भी कहाँ गेरेंटी है सुख मय वैवाहिक जीवन की
उन मियाँ-बीवी ने माँगा है तलाक़|
फिर तमाशे का तमाशा हो गया||
घनाक्षरी समापन पोस्ट - १० कवि, २३ भाषा-बोली, २५ छन्द
बहुत सी कुरीतियाँ हैं अपने समाज में .. पर धीरे धीरे समाधान निकलेगा ... हाँ आज कुछ नए तरीके के वैमनस्य उठने लगे अहिं समाज मिएँ जिनको दूर करना जरूरी है ...
लड़की वालों की विवशता का सटीक चित्रण किया है आपने.. सच में आज भी समाज के एक बड़े तबके के के माँ-बाप के सामने लड़की को विदा कराने में जो पापड बेलने पड़ते हैं, वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है... .. दुःख तो इस बात का बहुत होता है कि एक परिवार जो इस दौर से गुजरता है वह भी अपने समय भूल जाता है...
बहुत जागरूकता भरी प्रस्तुति ..आभार!
Very meaningful write-up. People should read it.
आपकी एक एक बात विचारणीय एवं अनुकरणीय है ! आपकी भावनाओं एवं विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ ! ऐसी घटनाएं मेरे मन को भी बहुत चोट पहुंचाती हैं ! काश लोगों की मानसिकता बदल पाती और समाज में एक स्वस्थ परम्परा विकसित हो पाती ! सार्थक आलेख के लिये बधाई !
आपने बहुत सटीक और उपयोगी आलेख लगाया है!
आज ऐसे ही प्रसंगों की आवश्यकता है!
प्रेरणाजी, बहुत ही सही लेख.
जो लोग लडकी और लडके मे कही भी किसी भी तरहका फर्क करते हे उन्हे अपने आपको सभ्य कहनेका अधिकार नही है. श्री मदन शर्माजी ने बिल्कुल सही फरमाया है की जब हमारे लडकेकी शादी होती है तब हम सब बाते भुल जाते है.
कमनसीब से हम कुछ ज्यादा ही व्यापारी बन गये है और शादी को भी ‘सोदा’ बना देते है !
जय हो !
सटीक, सार्थक और आलेख ......
आपका विश्लेषण उचित और सार्थक है।
आपके सुझाव अनुकरणीय हैं।
आपने बहुत सही कहा है |आज हर रस्म एक तिजारत हो गयी है |जाने कब इन कुरीतियों से समाज छुटकारा पाएगा |
आशा
बहुत सार्थक आलेख...बधाई.
ek sabhy samaaj me dahej jaisi soch ka bhi khandan hona chhaiye....sahi vichaar
http://teri-galatfahmi.blogspot.com/
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