बुधवार, 11 जनवरी 2012

दुनिया की सोच

    दुनिया की सोच  
  जिंदगी की तन्हाइयों से डर लगता है 
भीड़ में भी जब अकेले हो जाते हैं हम 
तो अपनी ही परछाइयों से डर लगता है 
दुनिया की सोच निराली हो रही है 
अब तो अपनी ही सोच से भी डर लगता है 
खून के रिश्ते भी स्वार्थी हो रहे है 
अब तो अपने खून से भी डर लगता है 
दुनिया की भीड़ में एक अपने को तरसते  हैं हम 
अब तो अपने को अपनाने से भी डर लगता है 
सब कुछ करने के बाद भी कुछ नहीं मिलता 
अब तो किसी के लिए कुछ करने से भी डर लगता है 
अच्छाई में भी बुराई देखते हैं लोग
अब तो अच्छाई करने से भी डर लगता है 
जन संख्या ज्यादा और इन्सानो की संख्या कम हो रही है 
अब तो इंसानों को इंसानों से भी डर लगता है 
हर तरफ अच्छाई पर बुराई की जीत हो रही है 
अब तो भगवान् पे विस्वास करने से भी मन डरने लगता है
ये दुनिया और इंसानों की सोच इतनी दूषित हो रही है 
की अब तो इस दुनिया में रहने में भी डर लगता है 
इंसानों के विचार और वातावरण इतना ख़राब हो रहा है 
की अब तो दुनिया के सर्वनाश होने का डर लगने लगता है  
  
  



7 टिप्‍पणियां:

मनीष सिंह निराला ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना !
अब तो अपने आप से भी डर लगता है !
मेरी नई पोस्ट पे आपका वागत है !

Kunwar Kusumesh ने कहा…

डरिये मत,एक दिन कुदरत सब ठीक कर देगी.

Atul Shrivastava ने कहा…

मौजूदा समय में दुनिया में हो रहे बदलाव, कम हो रही संवेदना और इंसानों के इंसान न बन पाने को चित्रित करती संवेदनशील रचना।

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

bhavnaon ki achhi prastuti ....abhar ke sath badhai .....

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर सृजन , बधाई.

मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर आप सादर आमंत्रित हैं.

कुमार राधारमण ने कहा…

सुना है,डर के आगे जीत है!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक दिन तो हम सबको मिटना है..