रविवार, 17 अप्रैल 2011

धूप- छावं


धूप अधिक ,छावं कम है जिंदगी
जिम्मदारियों को मंजिलों तक 
                                    पहुंचाने की चाह है जिंदगी 
रात -दिन मेहनत करके ,आधी से ज्यादा 
                                  धूप में  निकल जाती है जिंदगी 
इसी आशा में की जिम्मेदारियों से मुक्त होने पर 
                        ठंडी-ठंडी छावं में गुजर जायेगी जिंदगी 
पर जब जिम्मेदारियां मंजिल पाकर मुक्त होकर
                              हवा हो जातीं हैं 
तो दुःख से ठंडी-ठंडी छावं की आशा लिए 
                     दुनिया से विलुप्त हो जाती है जिंदगी    
      
        

7 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

"पर जब जिम्मेदारियां मंजिल पाकर मुक्त होकर
हवा हो जातीं हैं
तो दुःख से ठंडी-ठंडी छावं की आशा लिए
दुनिया से विलुप्त हो जाती है जिंदगी"

बिलकुल सच बात कही आपने.

सादर

Anupama Tripathi ने कहा…

zimmedariyon se bhari zindagi ka khoobsoorat chitran ....!!
Keep writing ..

नीलांश ने कहा…

पर जब जिम्मेदारियां मंजिल पाकर मुक्त होकर
हवा हो जातीं हैं
तो दुःख से ठंडी-ठंडी छावं की आशा लिए
दुनिया से विलुप्त हो जाती है जिंदगी

sunder rachna..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यही ज़िंदगी है धूप छाँव सी

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

nice .....

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

रात -दिन मेहनत करके ,आधी से ज्यादा
धूप में निकल जाती है जिंदगी

बहुत बढ़िया....

udaya veer singh ने कहा…

जिंदगी के विभिन्न आयामों को समझने का अच्छा प्रयास.. सुंदर है /